Monday, February 6, 2012

रामखेलावन मस्ती में (poem)

रामखेलावन मस्ती में (poem)
कवि-  डॉ० कृष्ण एन० शर्मा

मन झूमे तन डोले डग-मग, मस्त मगन जस कश्ती में,
चढ़ा के अद्धी, दबा के बीड़ा, रामखेलावन मस्ती में.

जेब में दारू पड़ी रहे, चाहे चौका भरभंड रहे,
लड़े लुगाई, बरें बिटवने, राशन बंद तो बंद रहे,
लेकिन दारु नगद खरीदें, महँग मिले चाहे सस्ती में,
चढ़ा के अद्धी, दबा के बीड़ा, रामखेलावन मस्ती में.

घर वाले व्यवहार से छूटे, हीत-नात समझाने में,
बदन गया बीमारी में, और माल गया मैखाने में,
मन तड़फड़ तन जर्जर-उज्जर, दिन बीतें अजलस्ती में
चढ़ा के अद्धी, दबा के बीड़ा, रामखेलावन मस्ती में.

खाली पेट चढ़ा के एक दिन, गिरे कहाँ कब ध्यान नहीं,
किसको फुर्सत कौन टटोले, होश नहीं या जान नहीं,
कौन लखै की मरे पड़े, या गिरे पड़े हैं गश्ती में,
चढ़ा के अद्धी, दबा के बीड़ा, रामखेलावन मस्ती में.

रामखेलावन घूँट-घूँट में, खुद ही काल के कौर हुए,
अगली पीढ़ी आई तो, कुछ रामखेलावन और हुए,
रूप नया, अंदाज़ नए, पर वही दौर फिर बस्ती में,
चढ़ा के अद्धी, दबा के बीड़ा, रामखेलावन मस्ती में.
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कवि-  डॉ० कृष्ण एन० शर्मा
फोन : +91-9320699167
ई-मेल :  dr.krisharma@gmail.com