Friday, September 14, 2012

तब समझो प्रेम-परायण हो : Poem by Dr. Krishna N. Sharma

तब समझो प्रेम-परायण हो
कवि: डॉ. कृष्ण एन. शर्मा

जब पद्य प्रेम की परिभाषा बन, छूए मन की गहराई।
जब छलके छंद छुवन से और, जब भरे चौकड़ी चौपाई।।
जब दो नैना मिल जाने से ही, दोहों का आभाव मिटे।
तब समझो प्रेम-परायण हो, है प्यार में थोड़ी सच्चाई।।

बस एक मिलन के वर्णन को, जब शब्द मिलें समुचित असीमित।
जब मीत लगे स्वरचित पद सी, अपनी-अपनी परिचित-परिचित।।
जब निपट अधूरे जीवन में, संपूर्ण लगे अक्षर ढाई।

तब समझो प्रेम-परायण हो, है प्यार में थोड़ी सच्चाई।।
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