Wednesday, June 12, 2013

ऐसी की तैसी

होती हैं बातें अपनी सबके दरमियाँ कैसी?!
कौन-कौन करता है बातें कहाँ-कहाँ कैसी?!
किस-किस की जुबान खैन्चें, किसको समझाएं?!
छोड़ दिया दिल पे ही लेना, ऐसी की तैसी।

छोटी-छोटी बातों पे भी जलजला आ जाता है,
चार लोग मिलते हैं और फैसला आ जाता है,
ऐसे किसी फैसले को भाव क्यों दें,
जिसमें ना मुकदमा, न कचहरी, न कोई पेशी!

- डॉ० कृष्ण एन० शर्मा